बेलगाम होता चीन

Nov 19, 2021
Source: https://www.jagran.com/

चीन के सैनिकों ने लद्दाख से लगती भारतीय सीमा में घुसने और इस क्रम में भारतीय सैनिकों पर पत्थरबाजी करने की जो हरकत की वह चीन के अराजक और अशिष्ट व्यवहार का नया नमूना ही है। आखिर घुसपैठ की इस कोशिश को शत्रुतापूर्ण न माना जाए तो क्या माना जाए? सबसे शर्मनाक यह रहा कि चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा का अतिक्रमण तब किया जब भारत अपनी स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ मना रहा था। आखिर इसी दिन संघर्ष विराम का उल्लंघन करने वाली पाकिस्तानी सेना और चीनी सेना में क्या अंतर रह गया? क्या पाकिस्तान का अंध समर्थन करते-करते चीन अब उसी की तरह हरकतें करना भी सीख गया है? लद्दाख में अपने सैनिकों के अतिक्रमण के बाद चीन ने जिस तरह इस घटना से अनजान बनने की कोशिश की वह उसकी पैैंतरेबाजी के अलावा और कुछ नहीं। चीनी विदेश मंत्रालय भले ही इस घटना से अनभिज्ञता जता रहा हो, लेकिन यह संभव नहीं कि उसे यह पता न हो कि उसके सैनिकों ने क्या गुल खिलाया है? चीन भारत को नीचा दिखाने के जिस रास्ते पर चल निकला है उसके नतीजे खुद उसके लिए अच्छे नहीं होंगे। वह भारतीय जनता के बीच एक ऐसे देश के तौर पर उभर आया है जो भारत के हितों को जानबूझकर चोट पहुंचा रहा है। भारतीय यह भूल नहीं सकते कि वह किस तरह भारत पर हमले कराने वाले आतंकी मसूद अजहर की ढाल बना हुआ है? यह समझना कठिन है कि सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य और खुद को महाशक्ति बताने के लिए लालायित देश इतना गैर जिम्मेदारी भरा बर्ताव कैसे कर सकता है?
चीन करीब-करीब अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ विवादों पर मनगढ़ंत ऐतिहासिक तथ्यों का तो उल्लेख करता ही है, तरह-तरह की संधियों का हवाला देकर उनकी मनमानी व्याख्या भी करता है। कभी वह किसी संधि को नकार देता है तो कभी किसी अन्य संधि को अंतिम करार देता है। डोकलाम के मामले में वह ठीक यही कर रहा है। वह हाल की अर्थात 2012 की संधि की तो अनदेखी कर रहा है, लेकिन 1890 की संधि को निर्णायक बताने में लगा हुआ है। ऐसा लगता है कि दुनिया पर अपनी छाप छोड़ने की धुन में उसे यही भान नहीं कि अंतरराष्ट्रीय मूल्य-मान्यताएं क्या कहती हैैं? यदि भारत के साथ उसका सीमा विवाद है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह रह-रह कर उसकी सीमाओं से छेड़छाड़ करे। चीन डोकलाम विवाद को लेकर बीते दो माह से भारत के प्रति जैसी भाव-भंगिमा अपनाए हुए है उससे वह उत्तर कोरिया की बराबरी करता ही दिख रहा है। आए दिन अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल करते हुए धमकियां देना और हर मामले में खुद को सही बताना तानाशाही के भोंडे प्रदर्शन के अलावा और कुछ नहीं। ऐसा देश आर्थिक रूप से कितना भी ताकतवर हो जाए, वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा अर्जित नहीं कर सकता। ध्यान रहे कि चीन ने अपने बेजा बर्ताव से पहले ही अपनी छवि एक ऐसे देश की बना रखी है जो बात-बात पर सबको धमकियां देता रहता है। अच्छा हो कि उसे यह समझ आए कि उसके मनमाने और अड़ियल रवैये से दुनिया भर में उसकी बदनामी ही हो रही है।

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