ब्रिक्स 2026: भारत की कूटनीतिक ताकत, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक दक्षिण की आवाज का नया मंच
भारत की अध्यक्षता में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 ने वैश्विक कूटनीति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, आतंकवाद, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक दक्षिण की भूमिका से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों को एक साझा मंच प्रदान किया। सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विभिन्न विश्व नेताओं के साथ हुई बैठकों और भारत की ओर से प्रस्तुत प्रस्तावों ने यह संकेत दिया कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत केवल अपनी आर्थिक और रणनीतिक भूमिका का विस्तार ही नहीं कर रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
सम्मेलन के केंद्र में ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार की निर्बाधता, आतंकवाद के प्रति कठोर रुख, संयुक्त राष्ट्र सहित बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को वैश्विक एजेंडे में अधिक स्थान देने जैसे विषय रहे। इसके साथ ही भारत ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति, ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई प्रौद्योगिकी में सहयोग जैसे क्षेत्रों को भी भविष्य की आर्थिक साझेदारी से जोड़ा।
भारत की बढ़ती भूमिका पर विश्व नेताओं का जोर
सम्मेलन में भाग लेने वाले कई राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों ने भारत की आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक भूमिका का उल्लेख किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से लेकर द्विपक्षीय बैठकों तक भारत की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में हुए परिवर्तन चर्चा का विषय बने।
पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने भारत के साथ अफ्रीकी देशों और ब्राजील को स्थायी प्रतिनिधित्व दिए जाने की आवश्यकता का समर्थन करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा उठाया। उनका रुख उस व्यापक मांग को दर्शाता है जिसमें वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात की जा रही है।
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने भारत में ऊर्जा पहुंच के विस्तार की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में ऊर्जा उपलब्धता में हुए व्यापक विस्तार का उल्लेख किया। उन्होंने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को भी रेखांकित किया और कहा कि दोनों देशों के बीच सहयोग निरंतर मजबूत हुआ है।
भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे ने भारत और ब्राजील जैसी उभरती शक्तियों की भूमिका की सराहना की। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने और छोटे तथा विकासशील देशों के लिए अधिक अवसर सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
वैश्विक दक्षिण के लिए भारत का स्पष्ट संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स मंच से वैश्विक दक्षिण की भूमिका को और प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका संदेश था कि नई विश्व व्यवस्था में विकासशील देशों को केवल वैश्विक नियमों का पालन करने वाला पक्ष नहीं, बल्कि उन्हें आकार देने वाला भागीदार बनना चाहिए।
भारत ने इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे संस्थानों में सुधार की मांग को दोहराया। यह तर्क दिया गया कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का ढांचा बीते दौर की शक्ति-संरचना को अधिक प्रतिबिंबित करता है, जबकि विश्व अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकी में बड़े बदलाव आ चुके हैं।
ब्रिक्स के माध्यम से भारत ने ऐसी वैश्विक व्यवस्था की पैरवी की जिसमें शासन, वित्त, व्यापार, प्रौद्योगिकी और सुरक्षा से जुड़े निर्णयों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों की आवाज अधिक प्रभावशाली हो।
आतंकवाद पर 'जीरो टॉलरेंस' और पहलगाम हमले का उल्लेख
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख प्रमुख विषयों में शामिल रहा। नई दिल्ली घोषणा में आतंकवाद के सभी स्वरूपों की निंदा और इसके खिलाफ दोहरे मानदंडों से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
घोषणा में पहलगाम में हुए आतंकी हमले का उल्लेख करते हुए आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता रेखांकित की गई। साथ ही आतंकवाद के वित्तपोषण, सीमा-पार नेटवर्क और सुरक्षित ठिकानों के विरुद्ध कार्रवाई पर भी ध्यान केंद्रित किया गया।
भारत लंबे समय से वैश्विक मंचों पर यह आग्रह करता रहा है कि आतंकवाद को किसी भी राजनीतिक, धार्मिक या रणनीतिक तर्क के आधार पर अलग-अलग दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। ब्रिक्स मंच पर इस विषय को मिली प्रमुखता भारत के कूटनीतिक एजेंडे की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखी गई।
ईरान-यूएई तनाव के बीच संवाद का मंच बना ब्रिक्स
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के बीच ब्रिक्स सम्मेलन ने संवाद और कूटनीति के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराया। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात से जुड़े तनाव के संदर्भ में ब्रिक्स नेताओं ने विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर जोर दिया।
भारत ने ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर अपनी चिंता स्पष्ट की। पश्चिम एशिया में किसी भी प्रकार का बड़ा संघर्ष वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव डाल सकता है। ऐसे में भारत ने संवाद, कूटनीति और बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
ऊर्जा सुरक्षा पर ब्रिक्स की बड़ी सहमति
ब्रिक्स देशों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के निर्बाध प्रवाह और महत्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा को आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक बताया। वैश्विक व्यापार मार्गों पर बढ़ते जोखिमों के बीच सदस्य देशों ने विविध स्रोतों से ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
ब्रिक्स घोषणा में तेल, गैस और अन्य ऊर्जा स्रोतों की निरंतर उपलब्धता के साथ-साथ स्मार्ट ग्रिड, ऊर्जा भंडारण, परमाणु ऊर्जा, जलविद्युत, नवीकरणीय ऊर्जा और कम-कार्बन प्रौद्योगिकी की भूमिका को भी स्वीकार किया गया।
समूह ने इस बात पर भी जोर दिया कि ऊर्जा संक्रमण के दौरान जीवाश्म ईंधनों की भूमिका को अचानक समाप्त नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऊर्जा सुरक्षा, affordability और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक होगा।
इसके साथ ही स्मार्ट ग्रिड और ऊर्जा भंडारण के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने, बिजली प्रणालियों को आधुनिक बनाने और नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ने की क्षमता मजबूत करने पर सहमति बनी।
भारत की डिजिटल और तकनीकी क्षमताओं को देखते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा डेटा एनालिटिक्स का उपयोग बिजली ग्रिड के प्रबंधन और दक्षता बढ़ाने में किए जाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।
महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला पर विशेष ध्यान
ऊर्जा संक्रमण और नई प्रौद्योगिकी के दौर में लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और दुर्लभ खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। ब्रिक्स देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों की विश्वसनीय, विविधतापूर्ण और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने की आवश्यकता को स्वीकार किया।
सदस्य देशों ने यह भी माना कि खनिज संसाधनों से संपन्न देशों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभु अधिकार होना चाहिए और वे राष्ट्रीय हितों तथा सार्वजनिक नीति के अनुरूप उनके उपयोग से संबंधित निर्णय ले सकें।
यह दृष्टिकोण इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण, रक्षा प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भविष्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा
ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और निवेश में स्थानीय मुद्राओं के अधिक इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा हुई। सदस्य देशों ने भुगतान तंत्र को अधिक विविध और मजबूत बनाने तथा सीमा-पार कारोबार को सरल बनाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार किया।
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने का उद्देश्य किसी एक वैश्विक मुद्रा को तत्काल प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि व्यापारिक भुगतान के विकल्प बढ़ाना, विनिमय दर से जुड़े जोखिम कम करना और सदस्य देशों के बीच आर्थिक लेन-देन को आसान बनाना है।
विशेष रूप से भारत जैसे बड़े बाजार के लिए यह व्यवस्था ऊर्जा आयात, वस्तु व्यापार और रणनीतिक क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग को अधिक लचीला बना सकती है।
भारत-यूएई संबंध और IMEC को नई गति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच हुई बैठक में भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे यानी IMEC को आगे बढ़ाने पर विशेष चर्चा हुई।
भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, निवेश और कनेक्टिविटी सहित कई क्षेत्रों में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है।
IMEC को भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच व्यापार, लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा कनेक्टिविटी बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण परियोजना माना जाता है। यदि यह परियोजना पूरी क्षमता के साथ विकसित होती है तो इससे भारत की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भूमिका और मजबूत हो सकती है।
पश्चिम एशिया में अनिश्चितता के बीच भारत और यूएई के मजबूत संबंधों को क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक समृद्धि और रणनीतिक सहयोग के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में प्रस्तुत किया गया।
भारत-चीन संबंधों में सुधार के संकेत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत ने भारत-चीन संबंधों में सुधार की संभावनाओं को भी रेखांकित किया। दोनों पक्षों ने सीमा पर शांति को द्विपक्षीय संबंधों के सामान्य विकास के लिए आवश्यक माना।
दोनों देशों के बीच संस्थागत संवाद को फिर सक्रिय करने, व्यापार संबंधों में संतुलन बढ़ाने और सीमा विवादों को उचित तंत्र के माध्यम से सुलझाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
भारत ने यह स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक द्विपक्षीय संबंधों की आधारशिला है। ऐसे में आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी समान रूप से संबोधित करना आवश्यक होगा।
ब्रिक्स से द्विपक्षीय कूटनीति तक मोदी की सक्रियता
ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अनेक देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं। इनमें रूस, चीन, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, यूएई और अन्य साझेदार देशों के साथ आर्थिक, रणनीतिक और सुरक्षा संबंधों पर चर्चा शामिल रही।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत में व्यापार, रक्षा, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग प्रमुख विषय रहे। भारत और रूस दशकों पुराने संबंधों को नए आर्थिक क्षेत्रों, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग से और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया के साथ महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग पर जोर दिया गया, जबकि मलेशिया के साथ आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
सांस्कृतिक कूटनीति ने भी खींचा ध्यान
ब्रिक्स सम्मेलन केवल राजनीति और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहा। भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी कूटनीतिक संवाद का हिस्सा बनाया।
भारत मंडपम में विश्व नेताओं के स्वागत के दौरान तमिलनाडु के रामनाथस्वामी मंदिर की भव्य छवि ने विशेष आकर्षण पैदा किया। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सहित कई नेताओं को भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े पहलुओं की जानकारी दी।
इससे पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को तमिल साहित्य के महान ग्रंथ 'तिरुक्कुरल' का रूसी अनुवाद भेंट किए जाने को भी भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का प्रतीक माना गया।
मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने ब्रिक्स के औपचारिक वातावरण में भारतीय सिनेमा से अपने जुड़ाव का परिचय देते हुए किशोर कुमार के प्रसिद्ध गीत का गायन किया, जिसने सम्मेलन में सांस्कृतिक आत्मीयता का एक अलग पक्ष प्रस्तुत किया।
ब्रिक्स 2026 से उभरा भारत का व्यापक एजेंडा
ब्रिक्स 2026 ने यह स्पष्ट किया कि भारत अपनी विदेश नीति को केवल पारंपरिक रणनीतिक साझेदारियों तक सीमित नहीं रख रहा। उसके एजेंडे में ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, आतंकवाद, नई तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज, वित्तीय व्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे विषय समान रूप से शामिल हैं।
भारत का प्रयास ऐसी वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देने का दिखाई देता है जिसमें विकासशील देशों के आर्थिक हितों और सुरक्षा चिंताओं को अधिक महत्व मिले, जबकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश के रास्ते खुले बने रहें।
सम्मेलन ने भारत को रूस, चीन, पश्चिम एशिया, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ एक साथ संवाद करने का अवसर दिया। यही बहुस्तरीय कूटनीति भारत की वर्तमान विदेश नीति की सबसे प्रमुख विशेषताओं में से एक बनकर उभरी है।
