महामारी के बाद भारत की जीवन प्रत्याशा में तेज सुधार, दो वर्षों में 2.9 वर्ष की बढ़ोतरी
WHO के आंकड़ों में दिखी रिकवरी; गैर-संचारी रोग बने बड़ी चुनौती, जबकि संक्रामक बीमारियों का बोझ भी पूरी तरह समाप्त नहीं
भारत ने महामारी के दौरान जीवन प्रत्याशा में आई गिरावट से उल्लेखनीय वापसी की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार देश की औसत जीवन प्रत्याशा 2021 में 68.1 वर्ष तक गिर गई थी, लेकिन इसके बाद इसमें तेज सुधार हुआ और यह 2022 में 70.5 वर्ष तथा 2023 में 71 वर्ष तक पहुंच गई। इस प्रकार केवल दो वर्षों में भारत ने लगभग 2.9 वर्ष की अपेक्षित आयु वापस हासिल की।
महामारी से पहले 2019 में भारत की जीवन प्रत्याशा लगभग 70.5 वर्ष थी। इसके मुकाबले 2021 में आई गिरावट ने स्वास्थ्य व्यवस्था और जनस्वास्थ्य पर महामारी के प्रभाव को स्पष्ट किया, लेकिन उसके बाद हुई रिकवरी देश की स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार और मृत्यु दर के सामान्य होने की ओर संकेत करती है।
स्वस्थ जीवन प्रत्याशा में भी सुधार, लेकिन गति अपेक्षाकृत धीमी
सिर्फ लंबे जीवन की अवधि ही नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन के वर्षों में भी सुधार दर्ज किया गया है। Healthy Life Expectancy 2021 में करीब 58.4 वर्ष थी, जो 2023 में बढ़कर लगभग 60.6 वर्ष हो गई।
हालांकि यह सुधार कुल जीवन प्रत्याशा की तुलना में थोड़ा धीमा रहा। 2019 के स्तर से स्वस्थ जीवन प्रत्याशा अभी भी करीब 0.1 वर्ष ऊपर रही। इससे यह संकेत मिलता है कि लोग औसतन अधिक समय तक जीवित तो रह रहे हैं, लेकिन जीवन के कुछ वर्ष बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी सीमाओं के साथ बीत सकते हैं।
60 वर्ष की उम्र के बाद भी जीवन प्रत्याशा बढ़ी
वरिष्ठ नागरिकों के संदर्भ में भी सुधार दिखाई देता है। 2023 में 60 वर्ष की आयु वाला व्यक्ति औसतन 18.8 वर्ष और जीवित रहने की उम्मीद कर सकता था, जबकि 2019 में यह आंकड़ा लगभग 18.4 वर्ष था।
इसी अवधि में पूर्ण स्वास्थ्य के साथ जीवन जीने की संभावित अवधि भी 13.4 वर्ष से बढ़कर 13.7 वर्ष हो गई। यह बदलाव बुजुर्ग आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं, रोग प्रबंधन और बेहतर चिकित्सा उपलब्धता के महत्व को रेखांकित करता है।
भारत का बीमारी पैटर्न तेजी से बदला
भारत की स्वास्थ्य चुनौतियों में पिछले दो दशकों में बड़ा बदलाव आया है। वर्ष 2000 के आसपास मृत्यु के प्रमुख कारणों में संक्रामक रोगों का वर्चस्व था। तपेदिक, डायरिया और अन्य संक्रमणजनित बीमारियां बड़ी संख्या में मौतों के लिए जिम्मेदार थीं।
उस समय शीर्ष 10 मृत्यु कारणों में संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी लगभग 62 प्रतिशत थी, जबकि गैर-संचारी रोगों की हिस्सेदारी करीब 34 प्रतिशत थी।
2023 तक यह तस्वीर लगभग उलट गई। गैर-संचारी रोगों की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 75 प्रतिशत हो गई, जबकि संक्रामक रोगों की हिस्सेदारी लगभग 16 प्रतिशत रह गई।
हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी और मधुमेह बने बड़ी चुनौती
भारत में मृत्यु के प्रमुख कारणों में अब गैर-संचारी रोगों का दबदबा है। इनमें इस्केमिक हृदय रोग, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, स्ट्रोक और मधुमेह प्रमुख हैं।
आंकड़ों के अनुसार 2023 में इनकी मृत्यु दर क्रमशः लगभग 138.5, 83.19, 74.8 और 49.01 प्रति एक लाख आबादी दर्ज की गई।
यह बदलाव बताता है कि भारत के सामने स्वास्थ्य नीति की चुनौती अब केवल संक्रामक रोगों के नियंत्रण तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवनशैली, प्रदूषण, खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और वृद्ध होती आबादी से जुड़े रोग भी बड़ी चिंता बन चुके हैं।
संक्रामक रोगों का खतरा अब भी कायम
गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ के बावजूद संक्रामक बीमारियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डायरिया, तपेदिक और निचले श्वसन तंत्र के संक्रमण अभी भी भारत में मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
इससे स्पष्ट है कि भारत को एक साथ दोहरी स्वास्थ्य चुनौती का सामना करना पड़ रहा है—एक ओर पुराने संक्रामक रोगों का नियंत्रण, दूसरी ओर तेजी से बढ़ते जीवनशैली आधारित रोगों से निपटना।
वैश्विक स्तर पर भी यही रुझान
दुनिया भर में भी गैर-संचारी रोगों का बोझ तेजी से बढ़ा है। 2023 में वैश्विक स्तर पर करीब 74 प्रतिशत मौतें NCDs के कारण हुईं, जबकि वर्ष 2000 में यह आंकड़ा लगभग 58 प्रतिशत था।
विश्व के शीर्ष 10 मृत्यु कारणों में से आठ अब गैर-संचारी रोगों से जुड़े हैं। यह बदलाव वैश्विक स्वास्थ्य नीति में रोकथाम, नियमित जांच और जीवनशैली सुधार की बढ़ती जरूरत को दर्शाता है।
वैश्विक जीवन प्रत्याशा महामारी-पूर्व स्तर के करीब
2023 में वैश्विक जीवन प्रत्याशा लगभग 73.3 वर्ष दर्ज की गई, जो 2019 के 73.4 वर्ष के लगभग बराबर है। वहीं स्वस्थ जीवन प्रत्याशा करीब 62.8 वर्ष रही, जो 2019 के स्तर से अभी भी लगभग 0.4 वर्ष कम है।
यह अंतर बताता है कि महामारी के बाद मृत्यु दर तो काफी हद तक सुधरी है, लेकिन स्वस्थ जीवन के वर्षों की पूरी रिकवरी अभी बाकी है।
भारत के लिए आगे की चुनौती
भारत में जीवन प्रत्याशा की तेज वापसी सकारात्मक संकेत है, लेकिन बदलते रोग पैटर्न के कारण स्वास्थ्य नीति को अब नए संतुलन की आवश्यकता है।
हृदय रोग, मधुमेह, स्ट्रोक और सांस संबंधी बीमारियों की रोकथाम के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, स्वस्थ आहार, शारीरिक सक्रियता, प्रदूषण नियंत्रण और शुरुआती निदान पर अधिक जोर देना होगा। साथ ही तपेदिक और अन्य संक्रामक रोगों के खिलाफ जारी कार्यक्रमों को कमजोर नहीं पड़ने देना होगा।
भारत की बढ़ती जीवन प्रत्याशा केवल अधिक वर्षों तक जीवित रहने की कहानी नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि बढ़े हुए ये वर्ष स्वस्थ, सक्रिय और गुणवत्तापूर्ण जीवन के रूप में भी जुड़ें।
