The structural integrity and safety of the ‘Standing Hanuman’ statue will undergo scientific testing.

उज्जैन के प्राचीन मंदिर में प्रतिमा की नींव, भार वहन क्षमता और भूमिगत संरचना की तकनीकी जांच के बाद होगा आगे का निर्णय

 

उज्जैन के छत्री चौक क्षेत्र स्थित प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा को हटाने या स्थानांतरित करने से पहले अब उसकी संरचनात्मक मजबूती का वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाएगा। मंदिर मार्ग चौड़ीकरण योजना के दायरे में आने के कारण प्रतिमा की स्थिति को लेकर चर्चा बनी हुई थी, लेकिन प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि बिना तकनीकी जांच के कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जाएगा।

 

प्रशासन के अनुसार विशेषज्ञों की टीम प्रतिमा के भार, आधार, गहराई और आसपास की संरचना का परीक्षण करेगी। जांच के बाद ही यह तय होगा कि प्रतिमा को किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित किया जा सकता है या उसे उसी स्थान पर सुरक्षित रखना अधिक उचित होगा।

 

मार्ग चौड़ीकरण योजना के कारण उठा सवाल

 

धार्मिक स्थलों के आसपास मार्ग चौड़ीकरण की योजना के तहत मंदिर के ढांचे को हटाया जा चुका है। इसके बाद प्रतिमा को भी हटाए जाने की संभावना को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चाएं शुरू हुईं।

 

प्रशासन ने इन चर्चाओं को लेकर स्पष्ट किया कि प्रतिमा स्थानांतरित करने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। पहले तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा इसकी वास्तविक संरचना और आधार की स्थिति का आकलन किया जाएगा।

 

पहले भी हटाने का प्रयास रहा असफल
मार्ग चौड़ीकरण प्रक्रिया के दौरान मंदिर के बाहरी ढांचे को हटाने के बाद प्रतिमा को चयनित स्थान पर पुनर्स्थापित करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन प्रतिमा की नींव अपेक्षा से अधिक गहरी होने के कारण उसे हटाने का प्रयास रोकना पड़ा।

 

इसके बाद श्रद्धालुओं के दर्शन की सुविधा बनाए रखने के लिए प्रतिमा के आसपास अस्थायी व्यवस्था की गई। प्रतिमा को न हटाए जाने की मांग को लेकर भक्तों और विभिन्न हिंदू संगठनों ने भी अपनी बात रखी है।

 

करीब 170 वर्ष पुराना मंदिर
मंदिर का इतिहास लगभग 170 वर्ष पुराना बताया जाता है और इसका निर्माण 1857 के आसपास का माना जाता है। मंदिर और प्रतिमा से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं के कारण इसका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व भी विशेष माना जाता है।

 

मंदिर से जुड़े परंपरागत विवरणों के अनुसार प्रतिमा की स्थापना उज्जैन के सिंधिया काल से जुड़ी हो सकती है और इसे राजकीय दौर की शिल्प परंपरा का उदाहरण भी माना जा रहा है। इसी कारण प्रतिमा की ऐतिहासिकता और मूल संरचना को संरक्षित रखने की मांग भी उठ रही है।

 

इंटरलॉकिंग तकनीक से बनी हो सकती है संरचना
विशेषज्ञों के अनुसार प्रतिमा के नीचे पुराने समय की इंटरलॉकिंग निर्माण तकनीक से बनी संरचना होने की संभावना है। इस तकनीक में पत्थरों को इस प्रकार जोड़ा जाता था कि वे आपसी भार और पकड़ के माध्यम से पूरी संरचना को मजबूती प्रदान करें।

 

यही कारण हो सकता है कि प्रतिमा को हटाना सामान्य निर्माण को हटाने जितना सरल नहीं रहा। यदि खुदाई या स्थानांतरण गलत तरीके से किया गया तो प्रतिमा या उसके आधार को नुकसान पहुंचने का जोखिम हो सकता है।

 

वैज्ञानिक जांच तय करेगी आगे की राह
तकनीकी परीक्षण में यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि प्रतिमा का आधार कितनी गहराई तक है, उसका वास्तविक भार कितना है और उसके आसपास की जमीन तथा भूमिगत संरचना किस स्थिति में है।

 

विशेषज्ञ यह भी देखेंगे कि प्रतिमा को बिना क्षति पहुंचाए उठाना व्यावहारिक है या नहीं। यदि स्थानांतरण से संरचना को नुकसान का खतरा अधिक पाया जाता है, तो उसे वर्तमान स्थान पर संरक्षित रखने के विकल्प पर विचार किया जा सकता है।

 

विकास और विरासत संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती

 

यह मामला शहरी विकास और ऐतिहासिक-धार्मिक विरासत संरक्षण के बीच संतुलन की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। मार्ग चौड़ीकरण जैसी परियोजनाएं यातायात और आधारभूत ढांचे के लिए जरूरी होती हैं, लेकिन प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं के मामले में वैज्ञानिक मूल्यांकन तथा संवेदनशील योजना आवश्यक हो जाती है।

 

खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा पर होने वाली तकनीकी जांच का परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि विकास कार्यों के साथ इसकी ऐतिहासिक, धार्मिक और संरचनात्मक पहचान को किस प्रकार सुरक्षित रखा जा सकता है।