सही जीवनशैली और उपचार से 80 प्रतिशत तक घट सकता है ब्रेन स्ट्रोक का जोखिम
संतुलित आहार, जोखिम कारकों पर नियंत्रण और चिकित्सकीय उपचार से बचाव संभव; नए अध्ययनों ने दिए उत्साहजनक संकेत
ब्रेन स्ट्रोक मृत्यु और दीर्घकालिक दिव्यांगता के प्रमुख कारणों में शामिल है, लेकिन इसके अधिकांश जोखिम कारकों को नियंत्रित किया जा सकता है। अमेरिकन स्ट्रोक एसोसिएशन के अनुसार, स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर और रक्तचाप, मधुमेह तथा कोलेस्ट्रॉल जैसी स्थितियों का समुचित प्रबंधन करके लगभग 80 प्रतिशत स्ट्रोक रोके जा सकते हैं। यह प्रतिशत व्यक्तिगत गारंटी नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर संभावित रोकथाम का अनुमान है।
स्ट्रोक उस समय होता है जब मस्तिष्क की किसी रक्तवाहिका में रुकावट आने या उसके फटने से रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है। समय पर उपचार न मिलने पर मस्तिष्क का प्रभावित हिस्सा स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकता है।
भूमध्यसागरीय आहार से जोखिम में कमी
एक लाख से अधिक महिलाओं पर किए गए दीर्घकालिक अध्ययन में भूमध्यसागरीय शैली का आहार अपनाने वाली महिलाओं में सभी प्रकार के स्ट्रोक का जोखिम लगभग 18 प्रतिशत कम पाया गया। इस भोजन पद्धति में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, मेवे, बीज, जैतून का तेल और मछली प्रमुख होते हैं, जबकि लाल मांस, अत्यधिक नमक और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ सीमित रखे जाते हैं।
यह अध्ययन संबंध दर्शाता है, प्रत्यक्ष कारण सिद्ध नहीं करता। फिर भी रक्तचाप, सूजन, कोलेस्ट्रॉल और रक्तवाहिकाओं के स्वास्थ्य पर इसके सकारात्मक प्रभाव इसे स्ट्रोक रोकथाम के लिए उपयोगी बनाते हैं। सामान्य रूप से प्रतिदिन फल-सब्जियां, पर्याप्त फाइबर और कम नमक वाला भोजन अपनाना लाभकारी माना जाता है।
शिंगल्स टीके से संभावित अतिरिक्त लाभ
कुछ अध्ययनों में शिंगल्स यानी हर्पीज जोस्टर का टीका लगवाने वालों में स्ट्रोक और हृदय संबंधी घटनाओं का जोखिम कम पाया गया है। एक वैश्विक समीक्षा में 50 वर्ष या उससे अधिक आयु के टीकाकृत लोगों में हृदय संबंधी घटनाओं का जोखिम लगभग 16 प्रतिशत कम पाया गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह संबंध अभी कारण और प्रभाव को प्रमाणित नहीं करता तथा अधिक अध्ययन आवश्यक हैं।
शिंगल्स का टीका केवल स्ट्रोक रोकने के उद्देश्य से नहीं लगवाया जाना चाहिए। इसकी आवश्यकता, पात्रता और समय का निर्णय आयु, स्वास्थ्य स्थिति और राष्ट्रीय टीकाकरण दिशा-निर्देशों के अनुसार डॉक्टर से परामर्श करके किया जाना चाहिए।
दूसरी बार स्ट्रोक रोकने की नई संभावना
पहले नॉन-कार्डियोएम्बोलिक इस्केमिक स्ट्रोक या उच्च जोखिम वाला ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक झेल चुके मरीजों पर ‘असुंडेक्सियन’ नामक दवा का परीक्षण किया गया है। चरण-तीन परीक्षण में मानक एंटीप्लेटलेट उपचार के साथ यह दवा लेने वाले 6.2 प्रतिशत मरीजों को दोबारा इस्केमिक स्ट्रोक हुआ, जबकि प्लेसीबो समूह में यह दर 8.4 प्रतिशत रही—अर्थात सापेक्ष जोखिम में लगभग 26 प्रतिशत कमी। प्रमुख रक्तस्राव में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं पाई गई।
यह दवा प्रत्येक मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है और इसे बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं लिया जा सकता। नियामकीय स्वीकृति, मरीज के स्ट्रोक का कारण और रक्तस्राव का व्यक्तिगत जोखिम उपचार तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।
रक्तचाप और शुगर की जांच सबसे जरूरी
उच्च रक्तचाप स्ट्रोक का सबसे बड़ा नियंत्रित किया जा सकने वाला जोखिम कारक है। इसके अलावा मधुमेह, धूम्रपान, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, अनियमित नींद, अत्यधिक शराब सेवन और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल भी जोखिम बढ़ाते हैं।
बचाव के लिए रक्तचाप, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच, कम नमक वाला भोजन और सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता का व्यायाम उपयोगी है।
पहले स्ट्रोक या टीआईए का सामना कर चुके मरीज अपनी निर्धारित दवाएं स्वयं बंद या परिवर्तित न करें। चेहरे का अचानक टेढ़ा होना, एक हाथ में कमजोरी, बोलने में कठिनाई, संतुलन बिगड़ना या अचानक दृष्टि प्रभावित होना स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत आपात चिकित्सा सहायता लेना आवश्यक है।
