विश्व मंच पर रजत पदक जीतने वाली भारतीय पावरलिफ्टर ने ऑनलाइन लैंगिक भेदभाव पर उठाई आवाज
भारतीय पावरलिफ्टर केया कुणाल बनर्जी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करते हुए विश्व जूनियर पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीता, लेकिन उनकी उपलब्धि के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा उनके खेल प्रदर्शन से हटकर उनके शारीरिक रूप-रंग पर केंद्रित हो गई। इस अनुभव को उन्होंने महिलाओं के प्रति ऑनलाइन दुनिया में मौजूद लैंगिक भेदभाव का उदाहरण बताया।
21 वर्षीय बनर्जी ने दक्षिण अफ्रीका के सन सिटी में आयोजित 2026 IPF World Sub-Junior and Junior Classic Powerlifting Championships में जूनियर महिला 47 किलोग्राम वर्ग में हिस्सा लिया। प्रतियोगिता के दौरान उनका वजन 45.7 किलोग्राम था, जबकि उन्होंने डेडलिफ्ट में 140 किलोग्राम वजन उठाया—यानी अपने शरीर के वजन से तीन गुना से भी अधिक। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने व्यक्तिगत डेडलिफ्ट स्पर्धा में दूसरा स्थान हासिल कर रजत पदक जीता।
उनके प्रदर्शन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अपेक्षा थी कि चर्चा उनकी ताकत, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि पर केंद्रित होगी। इसके विपरीत बड़ी संख्या में ऑनलाइन प्रतिक्रियाएं उनके व्यक्तित्व और शारीरिक बनावट को लेकर होने लगीं। बनर्जी ने कहा कि एक पुरुष खिलाड़ी को बड़ी प्रतियोगिता जीतने के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया मिलती है, महिला खिलाड़ी के साथ अक्सर वैसा व्यवहार नहीं किया जाता।
मामला केवल टिप्पणियों तक सीमित नहीं रहा। रिपोर्ट के अनुसार उन्हें साइबरबुलिंग, फर्जी खातों से हमलों और उनकी तस्वीरों के अनधिकृत इस्तेमाल जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। उनकी पहचान और तस्वीरों का इस्तेमाल कर बड़ी संख्या में एआई से बदली हुई तस्वीरें भी तैयार किए जाने की बात सामने आई।
यह घटना महिला खिलाड़ियों के सामने मौजूद एक गंभीर डिजिटल चुनौती को रेखांकित करती है। खेल के मैदान पर प्रदर्शन करने वाली महिला एथलीटों को कई बार उपलब्धियों से अधिक उनके रूप, पहनावे या व्यक्तिगत जीवन के आधार पर आंका जाता है। इससे न केवल खिलाड़ी की उपलब्धि पीछे छूट जाती है, बल्कि ऑनलाइन उत्पीड़न मानसिक दबाव भी पैदा कर सकता है।
बनर्जी का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका प्रदर्शन अपने आप में असाधारण था। 45.7 किलोग्राम के शरीर के वजन के साथ 140 किलोग्राम का डेडलिफ्ट उनकी तकनीकी क्षमता, प्रशिक्षण और शारीरिक ताकत को दर्शाता है। इसके बावजूद सोशल मीडिया विमर्श का केंद्र उपलब्धि के बजाय रूप-रंग बन जाना खेल जगत में लैंगिक समानता से जुड़ी बड़ी चुनौती को सामने लाता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से बढ़ते उपयोग ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। किसी व्यक्ति की तस्वीर से बिना अनुमति नकली या परिवर्तित तस्वीरें तैयार करना अब पहले की तुलना में बेहद आसान हो गया है। विशेष रूप से सार्वजनिक जीवन में मौजूद महिलाओं के लिए यह डिजिटल प्रतिष्ठा, निजता और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर जोखिम बनता जा रहा है।
खेल संगठनों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि साइबरबुलिंग और एआई आधारित तस्वीरों के दुरुपयोग से निपटने के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी। केवल आपत्तिजनक सामग्री हटाना पर्याप्त नहीं होगा; फर्जी खातों, डीपफेक और बिना अनुमति तैयार डिजिटल सामग्री के खिलाफ तेज कार्रवाई भी जरूरी होगी।
महिला खेलों की बढ़ती लोकप्रियता के साथ खिलाड़ियों के प्रति सामाजिक नजरिये में बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खिलाड़ियों का मूल्यांकन उनके प्रदर्शन, अनुशासन और उपलब्धियों के आधार पर होना चाहिए, न कि उनके बाहरी रूप के आधार पर।
केया कुणाल बनर्जी की उपलब्धि भारतीय पावरलिफ्टिंग के लिए गर्व का विषय है, लेकिन उनके अनुभव ने खेल से कहीं बड़ा सवाल खड़ा किया है—क्या डिजिटल समाज महिला खिलाड़ियों की उपलब्धियों को उसी सम्मान से देख पा रहा है, जैसा पुरुष खिलाड़ियों को मिलता है? उनकी आवाज इस बात की याद दिलाती है कि खेलों में वास्तविक समानता केवल मैदान पर समान अवसर देने से नहीं, बल्कि मैदान के बाहर भी खिलाड़ियों को सम्मान और सुरक्षित डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराने से सुनिश्चित होगी।
