शिक्षकों की चिकित्सा सुरक्षा से विद्यालयों के विकास तक — श्रीचंद शर्मा से खास बातचीत
द्वारा : सत्येन्द्र सिंह (एडिटर इन चीफ)
सत्येन्द्र सिंह: हमारे साथ शिक्षक विधान परिषद चुनाव में एक बार फिर मैदान में उतर रहे श्रीचंद शर्मा जी उपस्थित हैं। पिछले चुनाव में आपने अपने प्रतिद्वंद्वी को रिकॉर्ड मतों से पराजित किया था और इस बार उस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं। शिक्षकों और आम जनता के लिए आपकी सहज उपलब्धता आपकी विशिष्ट पहचान है। शर्मा जी, हमारे चैनल पर आपका हार्दिक स्वागत और अभिनंदन है।
श्रीचंद शर्मा: बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार भाई साहब।
सत्येन्द्र सिंह: सबसे पहले हम जानना चाहेंगे कि पिछले छह वर्षों में आपने शिक्षकों के लिए कौन-कौन से कार्य किए? सरकार के माध्यम से उनकी किन समस्याओं का समाधान किया गया और उन्हें कौन-सी सुविधाएं उपलब्ध हुईं?
श्रीचंद शर्मा: धन्यवाद भाई साहब। वर्ष 2020 में जब हमारा चुनाव हुआ था, तब शिक्षा व्यवस्था बेहद कठिन परिस्थितियों से जूझ रही थी। कोरोना महामारी के कारण विद्यालयों और शिक्षकों, दोनों के सामने बड़ी चुनौतियां थीं। विद्यालय प्रबंधन को संचालन की चिंता थी और शिक्षक भी अनेक कठिनाइयों से जूझ रहे थे।
उस समय फीस माफी को लेकर अभियान चल रहे थे। गाजियाबाद में आयोजित एक सभा में एक विधायक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी के सामने सभी विद्यार्थियों की फीस माफ करने का विषय रखा था। मुख्यमंत्री जी ने इस पर कहा कि यदि सभी की फीस एक साथ माफ कर दी जाए, तो
विद्यालय कैसे चलेंगे और शिक्षकों तथा शिक्षणेत्तर कर्मचारियों का वेतन कहां से आएगा? ऐसी स्थिति में पूरी शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो जाएगी।
बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन हो रही थी, लेकिन शिक्षकों को वेतन मिलना भी आवश्यक था। इसलिए यह व्यवस्था की गई कि विद्यालय कठिन परिस्थितियों में भले ही आधा वेतन दें, लेकिन शिक्षकों को वेतन अवश्य दें। घर पर रहते हुए भी उन्हें वेतन मिले—इस बात की चिंता की गई।
साथ ही अभिभावकों की कठिनाइयों को भी ध्यान में रखा गया। यदि किसी का रोजगार छूट गया हो, परिवार में कोई परेशानी हो या आर्थिक संकट हो, तो वह लिखित आवेदन दे और प्रधानाचार्य उसकी फीस माफ करें। लेकिन जिन अभिभावकों का व्यवसाय ठीक चल रहा था अथवा जिन्हें नियमित वेतन मिल रहा था, उनसे फीस देने की अपेक्षा की गई, ताकि विद्यालयों का संचालन और शिक्षा का वातावरण बना रहे।
उस समय सभी जगह विद्यालय बंद थे। पार्टी ने मुझे शिक्षक प्रकोष्ठ का प्रदेश संयोजक बनाया था। मैं अपने साथियों के साथ मुख्यमंत्री जी से मिलने जाता था और शिक्षकों तथा विद्यालयों की समस्याएं उनके सामने रखता था।
विद्यालय खुलवाने के विषय पर हमने उनके सामने यह पक्ष रखा था कि बच्चों पर कोरोना का कोई प्रभाव नहीं है। साथ ही हमने पढ़ाई के नुकसान की चिंता भी जताई। सामान्य ग्रीष्मकालीन अवकाश में भी बच्चे पढ़ी हुई बातों का लगभग आधा हिस्सा भूलने लगते हैं और विद्यालय खुलने पर उन्हें दोबारा अभ्यास कराना पड़ता है। यदि शिक्षा व्यवस्था वर्षों तक बंद रहती, तो बच्चे बहुत पीछे रह जाते।
हमने कहा कि विद्यालय खुलने चाहिए, क्योंकि ऑनलाइन शिक्षा पर्याप्त नहीं है। यदि केवल ऑनलाइन शिक्षा ही पर्याप्त होती, तो दुनिया में विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की आवश्यकता ही क्यों पड़ती?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी और तत्कालीन शिक्षा मंत्री दिनेश शर्मा जी ने हमारी बात मानी। हमने उत्तर प्रदेश के विद्यालय दिल्ली से भी लगभग 2 महीने पहले खुलवाए।
इसके बाद एक महत्वपूर्ण विषय वित्तविहीन और स्ववित्तपोषित विद्यालयों के शिक्षकों का था। चुनाव के दौरान भी हम कहते थे कि इन शिक्षकों को सुविधाओं का लाभ कैसे मिले और इन्हें व्यवस्था के दायरे में कैसे लाया जाए। इसके लिए हमने मुख्यमंत्री जी से आग्रह किया कि इन्हें आयुष्मान कार्ड की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
दूसरी ओर, सहायता प्राप्त विद्यालयों और प्राथमिक शिक्षा से जुड़े शिक्षक मांग कर रहे थे कि उन्हें भी राज्य के शिक्षकों की तरह कैशलेस और निःशुल्क चिकित्सा सुविधा मिले। हमने दोनों मांगें मुख्यमंत्री जी के सामने रखीं।
मैं इसके लिए योगी जी का धन्यवाद करता हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी आयुष्मान योजना के रूप में देश में एक विलक्षण स्वास्थ्य योजना लेकर आए। ऐसी स्वास्थ्य योजना पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। वर्ष 2011 की जनगणना में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों को इस सुविधा के अंतर्गत लिया गया। उन्हें और उनके परिजनों को 5 लाख रुपये तक के वार्षिक निःशुल्क उपचार की सुविधा दी गई।
इसी प्रकार मुख्यमंत्री योगी जी ने शिक्षकों के लिए एक महत्वपूर्ण व्यवस्था की। जब सरकार के माध्यम से सीधे यह सुविधा देना संभव नहीं हो पा रहा था, तो एक बीमा कंपनी के साथ करार किया गया। इसमें सरकार द्वारा प्रति कार्ड तीन हजार रुपये का प्रीमियम देने की व्यवस्था की गई। शिक्षक को अपनी ओर से एक रुपया भी जमा नहीं करना है। बदले में संबंधित शिक्षक और इस व्यवस्था में शामिल अन्य लाभार्थियों को पांच लाख रुपये तक के वार्षिक निःशुल्क उपचार की सुविधा मिलेगी।
इस करार के बाद कार्ड भी बनने लगे। अनेक लोगों के कार्ड बन चुके हैं और जिनके शेष हैं, उनके भी बनने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। संबंधित शासनादेश आने के बाद शेष कार्य भी आगे बढ़ेंगे।
पहले प्राथमिक शिक्षकों को कहा जाता था कि आप परिषद से जुड़े हैं, इसलिए आपको यह सुविधा नहीं मिल सकती। सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों से कहा जाता था कि आप माध्यमिक शिक्षा की अलग प्रबंधन व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं, इसलिए आपको यह सुविधा नहीं मिल सकती। लेकिन अब प्राथमिक शिक्षकों, सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों और निजी अथवा स्ववित्तपोषित संस्थानों में प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी इसमें शामिल किया गया है।
सत्येन्द्र सिंह: क्या यह सुविधा सभी को दी गई है?
श्रीचंद शर्मा: जी, प्राथमिक स्तर से विश्वविद्यालय स्तर तक के शिक्षकों को पांच लाख रुपये तक की वार्षिक कैशलेस चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इसमें शिक्षक के साथ उसके आश्रित परिजन—माता-पिता, पति या पत्नी और बच्चे—भी शामिल हैं।
सत्येन्द्र सिंह: यानी शिक्षक पर आश्रित परिजनों को भी इसका लाभ मिलेगा?
श्रीचंद शर्मा: जी, उन्हें भी शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त शिक्षामित्रों, अनुदेशकों, संविदा कर्मचारियों, आशा बहनों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और अधिवक्ताओं को भी इस कैशलेस चिकित्सा सुविधा के दायरे में लिया गया है।
हमारे आग्रह पर मुख्यमंत्री जी द्वारा उपलब्ध कराई गई यह सुविधा बड़ी उपलब्धि है। इससे शिक्षकों की चिकित्सा संबंधी कठिनाइयां कम हुई हैं। वित्तविहीन विद्यालयों के शिक्षकों को भी इसका लाभ मिलेगा। स्ववित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को भी लाभ मिलने लगा है।
मैं मुजफ्फरनगर गया था। वहां एक शिक्षक का ऑपरेशन हुआ और उनके ऑपरेशन तथा दवाइयों का पूरा खर्च कैशलेस चिकित्सा कार्ड से वहन किया गया। जिन अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड के अंतर्गत उपचार अनुमन्य है, वहां इस कैशलेस कार्ड के माध्यम से भी उपचार की सुविधा मिलेगी। यह शिक्षकों के लिए बहुत बड़ी सुविधा है।
इसके अतिरिक्त हमने शिक्षामित्रों, अनुदेशकों और व्यावसायिक शिक्षकों का मानदेय बढ़वाया। विषय विशेषज्ञ शिक्षकों को पुरानी पेंशन योजना में शामिल कराया। ऐसे अनेक विषय हमारे सामने आते रहे और हम उनका समाधान कराते रहे। ये हमारे पिछले कार्यकाल के प्रमुख कार्य हैं। अन्य विषयों पर भी आप प्रश्न कर सकते हैं।
सत्येन्द्र सिंह: उत्तर प्रदेश बोर्ड और सीबीएसई से जुड़े विद्यालयों के लिए आपने कौन-कौन से कार्य किए हैं?
श्रीचंद शर्मा: आपने अच्छा प्रश्न किया है। विद्यालयों की समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री जी भी चिंतित थे। अनेक सहायता प्राप्त विद्यालय 50, 75 या लगभग 100 वर्ष पहले स्थापित हुए थे। कहीं प्रबंध समिति भंग हो गई थी, कहीं कमजोर थी और कहीं विद्यालय भवन जर्जर हो गए थे।
भवनों की खराब स्थिति के कारण पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। बच्चों और शिक्षकों के साथ दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती थी। प्रश्न यह था कि इन भवनों को कैसे ठीक किया जाए। इसके समाधान के लिए मुख्यमंत्री जी अलंकार योजना लेकर आए।
इस योजना के लिए 500 करोड़ रुपये का बजट बनाया गया और जारी किया गया। इसमें 300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च भी हुए। प्रारंभ में व्यवस्था थी कि प्रबंध समिति अपने विद्यालय के कार्यों का प्रस्ताव दे। उदाहरण के लिए, यदि विद्यालय में एक करोड़ या दस करोड़ रुपये का कार्य होना है, तो उसकी 50 प्रतिशत राशि प्रबंध समिति दे और शेष 50 प्रतिशत सरकार उपलब्ध कराए।
बाद में यह सामने आया कि कई प्रबंध समितियां 50 प्रतिशत राशि भी नहीं जुटा पा रही हैं। तब व्यवस्था में बदलाव करके उनका योगदान 25 प्रतिशत कर दिया गया और शेष 75 प्रतिशत सरकार द्वारा देने की व्यवस्था की गई।
इसमें यह सुविधा भी दी गई कि प्रबंध समिति के 25 प्रतिशत योगदान में विधायक निधि और सांसद निधि से प्रस्तावित सहायता को भी उसका योगदान माना जाएगा। इससे विद्यालय भवनों के निर्माण और सुदृढ़ीकरण का रास्ता आसान हुआ।
हमने विद्यालयों के भवनों का सुदृढ़ीकरण शुरू कराया। स्मार्ट कक्षाओं, फर्नीचर और शौचालयों की व्यवस्था की गई। सहायता प्राप्त विद्यालयों के लिए इस दिशा में अच्छे कार्य हुए हैं।
निजी और स्ववित्तपोषित विद्यालयों की भी कई समस्याएं थीं। उन्हें प्रशासन योजना स्वीकृत करानी पड़ती थी। यह प्रक्रिया जिला विद्यालय निरीक्षक कार्यालय से होकर संयुक्त शिक्षा निदेशक कार्यालय तक जाती थी। इससे प्रबंधन संबंधी विवाद और प्रशासक नियुक्त होने जैसी परिस्थितियों की आशंका बनी रहती थी। सहायता प्राप्त विद्यालयों में ऐसे विवाद देखने को मिलते हैं और वैसी स्थिति स्ववित्तपोषित विद्यालयों में भी बन सकती थी।
मुख्यमंत्री जी ने विचार किया कि जब सरकार इन विद्यालयों का वित्तपोषण नहीं करती और ये अपने संसाधनों से चलते हैं, तो इनके संचालन में सरकारी हस्तक्षेप क्यों हो? इसलिए प्रशासन योजना की अनिवार्यता समाप्त करने का निर्णय लिया गया।
अब विद्यालय अपनी प्रबंध समिति द्वारा बनाई गई व्यवस्था के अनुसार चलेंगे। सरकार शैक्षिक स्तर को नियंत्रित करेगी और विद्यालय के संचालन की जिम्मेदारी प्रबंध समिति के पास रहेगी। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है।
इसके अतिरिक्त, वर्ष 2022 में नई शिक्षा नीति के संदर्भ में विद्यालयों की मान्यता के मानक बढ़ गए थे। इससे पहले से संचालित विद्यालयों के सामने कठिनाई आई। जो विद्यालय 2022 तक हाईस्कूल की मान्यता प्राप्त कर चुके थे और इंटरमीडिएट, विज्ञान, कला या किसी अन्य विषय की अतिरिक्त मान्यता लेना चाहते थे, उनके लिए पहले नए मानक लागू किए जा रहे थे।
हमने इस विषय का समाधान कर दिया है। पहले से स्थापित विद्यालयों को अतिरिक्त विषयों की मान्यता अथवा विस्तार के लिए पुराने मानकों का लाभ देने की व्यवस्था की गई। जिस समय विद्यालय स्थापित हुआ था, उस समय के भूमि संबंधी मानकों के आधार पर उसकी अतिरिक्त मान्यता हो सकेगी।
एक अन्य महत्वपूर्ण विषय भूमि का था। सीबीएसई की मान्यता के लिए लीज डीड पर ली गई भूमि स्वीकार की जाती थी। लेकिन उत्तर प्रदेश बोर्ड की मान्यता के लिए सोसायटी के नाम भूमि होने पर भी विद्यालय के नाम बैनामा कराना पड़ता था। अब मुख्यमंत्री योगी जी ने उत्तर प्रदेश बोर्ड की मान्यता के लिए भी लीज डीड वाली भूमि स्वीकार करने की व्यवस्था की है।
सीबीएसई की मान्यता लेने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र, यानी एनओसी प्राप्त करने में भी विद्यालयों को कठिनाई होती थी। हमने यह विषय केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जी और सीबीएसई के अध्यक्ष के सामने रखा। हमारा कहना था कि यदि कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश बोर्ड से संबद्ध अच्छा विद्यालय चला रहा है और सीबीएसई की मान्यता लेना चाहता है, तो एनओसी की कठिन प्रक्रिया उसके लिए बाधा नहीं बननी चाहिए।
मैं धर्मेंद्र प्रधान जी का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने हमारी बात मानी। अब सीबीएसई की मान्यता के आवेदन के साथ पहले से एनओसी लगाने की आवश्यकता नहीं है। सीबीएसई स्वयं राज्य से एनओसी मांगेगा। राज्य एक महीने में एनओसी दे देता है तो ठीक; यदि नहीं देता, तो 15 दिन का नोटिस दिया जाएगा। डेढ़ महीने तक भी एनओसी नहीं आती, तो उसे स्वतः स्वीकृत मानकर मान्यता देने की व्यवस्था की गई है।
विद्यालयों के विस्तार की समस्या भी थी। कोई विद्यालय 10 या 20 वर्ष से चल रहा है और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ गई है, तो उसे अतिरिक्त परिसर की आवश्यकता पड़ सकती है। इसके लिए यह सुविधा दी गई कि मौजूदा मान्यता के आधार पर दूसरे परिसर में प्राथमिक विभाग संचालित किया जा सकता है।
सत्येन्द्र सिंह: अच्छा, इसके लिए अलग से मान्यता लेने की आवश्यकता नहीं है?
श्रीचंद शर्मा: जी, अलग से मान्यता लेने की आवश्यकता नहीं है। कक्षा एक से पाँच तक का प्राथमिक विभाग दूसरे परिसर में संचालित किया जा सकता है। ऐसे अनेक विषयों का हमने समाधान कराया है।
भूमि के मानकों का विषय भी महत्वपूर्ण था। गाजियाबाद, मेरठ और नोएडा जैसे शहरों में जमीन काफी महंगी है। मैंने धर्मेंद्र प्रधान जी के सामने यह बात रखी कि दिल्ली में सीबीएसई हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के लिए 1,600 और 2,400 वर्गमीटर भूमि पर मान्यता देता है। अन्य महानगरीय क्षेत्रों में भी भूमि सस्ती या आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसलिए वहां के विद्यालयों के लिए भी भूमि के मानक कम किए जाने चाहिए।
मैं धर्मेंद्र प्रधान जी और सीबीएसई अध्यक्ष का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने हमारी बात सुनी। संबंधित विद्यालयों के लिए 2,400 और 3,200 वर्ग मीटर भूमि के मानकों की व्यवस्था की गई।
इसके साथ यह सुविधा भी दी गई कि यदि नगर पालिका या विकास प्राधिकरण का लगभग 3,000 वर्गमीटर का पार्क है और संबंधित निकाय लिखित रूप से विद्यालय की खेल गतिविधियों के लिए उसके उपयोग पर अनापत्ति देता है, तो उसे भी मान्यता की पात्रता के लिए स्वीकार किया जाएगा।
इस प्रकार उत्तर प्रदेश बोर्ड और सीबीएसई, दोनों से जुड़े विद्यालयों की अनेक समस्याओं का समाधान कराने के प्रयास किए गए हैं। आगे भी जो विषय हमारे सामने आएंगे, हम उनके समाधान के लिए प्रयासरत रहेंगे।
मैं यह नहीं कहता कि सारे काम पूरे हो गए हैं। कभी पूर्णता नहीं आती। आगे भी जीवन है और बहुत सारे काम बाकी हैं। इस कार्यकाल में हमने जो सीखा है और जिन विषयों पर काम करने की सोच है, उन्हें आगे बढ़ाने में जुटेंगे।
हमारा ध्यान इस बात पर है कि शिक्षकों और विद्यालयों का वातावरण बेहतर हो, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले और पाठ्यक्रम अच्छा बने। हम इन विषयों पर लगातार काम कर रहे हैं।
सत्येन्द्र सिंह: आपने हमारे अलग-अलग प्रश्न पूछने से पहले ही सभी विषयों को बहुत विस्तार से स्पष्ट कर दिया। इससे हमारे दर्शकों को भी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं।
श्रीचंद शर्मा: आपका प्रश्न ही इतना व्यापक था कि उसमें ये सभी विषय समाहित थे। इसलिए मैंने इन सभी बातों को विस्तार से आपके सामने रखा।
सत्येन्द्र सिंह: आपने सभी विषयों को बहुत अच्छे ढंग से समझाया। चुनाव की व्यस्तता और लगातार भागदौड़ के बीच आपने हमारे चैनल के लिए समय निकाला। इसके लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।
श्रीचंद शर्मा: बहुत-बहुत धन्यवाद। आपके माध्यम से मैं दर्शकों और शिक्षक मतदाताओं से भी अपील करना चाहूंगा कि 23 अक्टूबर को होने वाले चुनाव में मेरे और हमारी पार्टी के पक्ष में मतदान करें।
यह हमारे मतपत्र का नमूना है। शिक्षक मतदाता जब मतदान करने जाएंगे, तो वहां ईवीएम के स्थान पर मतपत्र होगा। मतपत्र में ऊपर से दूसरे स्थान पर मेरा नाम ‘श्रीचंद शर्मा भाजपा’ होगा। उसके आगे मेरा चित्र और फिर मतदान के लिए निर्धारित कॉलम होगा।
प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए गए पेन से उसी कॉलम में अंग्रेजी का अंक ‘1’ लिखकर मुझे प्रथम वरीयता दें और विजयी बनाने का आशीर्वाद प्रदान करें। यही मेरा आप सभी से निवेदन है।
बहुत-बहुत धन्यवाद। आप सभी को नमस्कार।
सत्येन्द्र सिंह: बहुत-बहुत धन्यवाद, शर्मा जी।
श्रीचंद शर्मा: धन्यवाद।
