जीएसटी परिषद के बड़े फैसले: दरों में राहत, छोटे कारोबारियों को संरक्षण और आईटीसी व्यवस्था में सुधार पर जोर

वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था को अधिक सरल, संतुलित और कारोबार-अनुकूल बनाने की दिशा में जीएसटी परिषद ने कई महत्वपूर्ण फैसले किए हैं। इन निर्णयों का असर आम उपभोक्ताओं से लेकर छोटे व्यापारियों, निर्माताओं और कर प्रशासन तक देखने को मिलेगा। परिषद ने जहां औसत जीएसटी दर में कमी के बाद राजस्व स्थिति का आकलन किया, वहीं छोटे कारोबारियों को अनावश्यक दंडात्मक कार्रवाई से राहत देने, इनपुट टैक्स क्रेडिट प्रक्रिया को बेहतर बनाने और कुछ लंबित मुद्दों के समाधान के लिए नई समितियां गठित करने का भी निर्णय लिया।

 

सितंबर 2026 में कर दरों में किए गए बदलावों के बाद औसत जीएसटी दर वर्ष 2023 के 11.4 प्रतिशत से घटकर 10.84 प्रतिशत पर आ गई। जीएसटी लागू होने के समय जुलाई 2017 में औसत प्रभावी दर करीब 15.8 प्रतिशत मानी गई थी। इसके बावजूद राजस्व संग्रह में मजबूती देखी गई है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती छह महीनों में जीएसटी संग्रह लगभग 11.6 प्रतिशत बढ़कर ₹12.46 लाख करोड़ तक पहुंचा। यह संकेत देता है कि दरों में कमी के बावजूद टैक्स बेस, अनुपालन और आर्थिक गतिविधियों में सुधार के कारण राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा।
 

 

जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक में छोटे कारोबारियों से जुड़ी शिकायतों और अनुपालन की जटिलताओं पर विशेष ध्यान दिया गया। परिषद ने स्पष्ट किया कि जीएसटी कानून का इस्तेमाल केवल दंडात्मक कार्रवाई के लिए नहीं होना चाहिए। छोटे व्यापारियों को राहत देते हुए यह निर्णय लिया गया कि सामान्य मामलों में जीएसटी अधिकारी सीधे गिरफ्तारी नहीं कर सकेंगे। गिरफ्तारी जैसे कदम के लिए निर्धारित प्रक्रिया और न्यायिक स्वीकृति आवश्यक होगी। इसका उद्देश्य कर प्रशासन में जवाबदेही बढ़ाना और छोटे कारोबारियों में अनावश्यक भय की स्थिति कम करना है।

 

परिषद ने मुकदमा चलाने की सीमा भी बढ़ाई है। पहले अपेक्षाकृत छोटी कर राशि पर भी आपराधिक कार्रवाई की आशंका बनी रहती थी, लेकिन अब सामान्य मामलों में अभियोजन की सीमा बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये कर दी गई है। इसी प्रकार नोटिस से जुड़े मामलों में भी राहत दी गई है। दस हजार रुपये से कम के मामलों में नोटिस जारी न करने तथा पूर्व में भेजे गए कुछ छोटे नोटिस वापस लेने जैसे कदमों से सूक्ष्म और छोटे कारोबारियों को अनुपालन संबंधी राहत मिलने की उम्मीद है।

 

रिटर्न फाइलिंग व्यवस्था में भी सुधार का प्रयास किया गया है। मामूली अंतर के कारण सिस्टम जनरेटेड नोटिस भेजे जाने की व्यवस्था की समीक्षा की गई है। हर वर्ष लगभग 95 हजार कारोबारियों को रिटर्न में छोटे अंतर के कारण स्वचालित नोटिस मिलते थे। अब बहुत मामूली अंतर, जैसे लगभग 0.8 प्रतिशत तक, पर स्वतः नोटिस जारी न करने की दिशा में व्यवस्था आसान की जा रही है। गलत रजिस्ट्रेशन नंबर या तकनीकी त्रुटि जैसी स्थितियों में भी करदाताओं को सुधार का अवसर देने पर जोर दिया गया है।

 

जीएसटी परिषद ने अधिकारियों की कार्रवाई की सीमा को लेकर भी महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। एक राज्य के अधिकारी को दूसरे राज्य से गुजर रहे माल पर अनावश्यक रोक या वाहन सीज करने की शक्ति सीमित की गई है। यदि किसी राज्य से गुजरते समय केवल जांच के नाम पर कार्रवाई की जाती है, तो इसके लिए निर्धारित अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया का पालन आवश्यक होगा। इस कदम से अंतरराज्यीय व्यापार में अनावश्यक बाधाओं को कम करने की कोशिश की गई है।

 

इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी आईटीसी को लेकर भी परिषद में व्यापक चर्चा हुई। हालांकि आईटीसी भुगतान में तेजी लाने के मुद्दे पर राज्यों के बीच पूर्ण सहमति नहीं बन सकी, इसलिए इस विषय पर अधिकारियों की एक समिति गठित की गई है। यह समिति अगले कुछ महीनों में अपनी रिपोर्ट देगी, जिसके आधार पर आगे निर्णय लिया जा सकता है। फिलहाल व्यवस्था ऐसी है कि एक कारोबार को इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ तभी मिलता है जब सप्लायर अपनी जीएसटी रिटर्न दाखिल कर कर का भुगतान कर देता है। यदि सप्लायर रिटर्न नहीं भरता तो खरीदार का आईटीसी अटक जाता है। इस व्यवस्था को लेकर लंबे समय से व्यापारिक संगठनों द्वारा चिंता जताई जाती रही है।

 

काउंसिल ने मशीनरी और प्लांट से जुड़े कुछ इनपुट टैक्स क्रेडिट प्रावधानों में भी राहत देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। कुछ उद्योगों, विशेषकर दवा और विनिर्माण क्षेत्र में, प्लांट और मशीनरी से जुड़ी सेवाओं पर आईटीसी उपलब्ध कराने की व्यवस्था से पूंजीगत लागत कम होने की उम्मीद है। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने और निवेश को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।

 

परिषद ने रिफंड व्यवस्था को सरल बनाने पर भी जोर दिया है। जोखिम आकलन के आधार पर अधिकतर रिफंड को तीन कार्य दिवसों में मंजूर करने की दिशा में व्यवस्था विकसित की जा रही है। इससे निर्यातकों और कार्यशील पूंजी पर निर्भर कारोबारियों को नकदी प्रवाह में राहत मिल सकती है। रिफंड दावों की प्रक्रिया सरल होने से कारोबारी पूंजी का अनावश्यक फंसाव कम होगा।

 

पंजीकरण प्रक्रिया में भी छोटे ई-कॉमर्स विक्रेताओं के लिए सरलता लाने का निर्णय लिया गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले छोटे विक्रेताओं को जीएसटी रजिस्ट्रेशन में आने वाली जटिलताओं को कम करने की दिशा में प्रक्रिया आसान की जाएगी। यह कदम ई-कॉमर्स आधारित सूक्ष्म उद्यमियों और छोटे विक्रेताओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने में सहायक हो सकता है।

 

इसके साथ ही कुछ आयात संबंधी मामलों में भी बदलाव किए गए हैं। बैंकों और नामित एजेंसियों द्वारा सोना, चांदी और प्लेटिनम के आयात पर तीन प्रतिशत आईजीएसटी लागू करने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य बुलियन और अन्य माध्यमों से होने वाले कीमती धातुओं के आयात पर कर व्यवस्था में समानता लाना है।

 

जीएसटी परिषद ने यह भी संकेत दिया कि प्रत्यक्ष कर प्रशासन की तरह जीएसटी में भी अनुपालन को अधिक तकनीक आधारित और कम दंडात्मक बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। टैक्स प्रशासन का फोकस केवल वसूली पर नहीं, बल्कि करदाता सुविधा, पारदर्शिता, त्वरित रिफंड और विवादों की संख्या कम करने पर भी रहेगा।

 

कुल मिलाकर परिषद के फैसले जीएसटी व्यवस्था को अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा सकते हैं। औसत कर दर में कमी के बावजूद राजस्व में वृद्धि, छोटे कारोबारियों को गिरफ्तारी और नोटिस से राहत, आईटीसी विवादों पर समीक्षा, त्वरित रिफंड और ई-कॉमर्स विक्रेताओं के लिए सरल पंजीकरण जैसे कदम यह संकेत देते हैं कि अब जीएसटी प्रशासन का जोर केवल कर संग्रह पर नहीं, बल्कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और करदाता विश्वास बढ़ाने पर भी है।