गुमराह करने वाली सामग्री पर व्यापक नियामक व्यवस्था की मांग, सुप्रीम कोर्ट में याचिका

स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट, इंटरनेट मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार सामग्री के लिए व्यापक नियामक ढांचा बनाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि भ्रामक अथवा गलत जानकारी बहुत कम समय में बड़े वर्ग तक पहुंच जाती है, जिससे संवैधानिक संस्थाओं, उनकी स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली को लेकर अनावश्यक विवाद, आलोचना और अटकलें उत्पन्न हो सकती हैं।

 

याचिकाकर्ता अधिवक्ता विशाल तिवारी ने गुरुग्राम में आयोजित कॉमेडियन प्रणीत मोरे के एक कार्यक्रम के दौरान की गई कथित विवादास्पद टिप्पणी का उल्लेख किया है। टिप्पणी में 370 रुपये को लेकर दिया गया कथित बयान विवाद का विषय बना था। इसके अतिरिक्त याचिका में इंटरनेट पर प्रसारित उन सूचनाओं का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें भारतीय जजों और केंद्रीय मंत्रियों के लंदन में आयोजित एक बैडमिंटन प्रतियोगिता में भाग लेने जैसे दावे किए गए थे।

 

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से स्टैंड-अप कॉमेडी, पॉडकास्ट, इंटरनेट मीडिया और एआई-निर्मित सामग्री के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तथा प्रभावी नियामक व्यवस्था विकसित करने का आग्रह किया गया है। इसमें कहा गया है कि मौजूदा कानूनी तंत्र प्रायः गलत सूचना के व्यापक प्रसार के बाद ही सक्रिय होता है।

 

यह मामला डिजिटल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन की बहस को नई दिशा देता है। प्रस्तावित व्यवस्था में भ्रामक सामग्री पर नियंत्रण के साथ यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण होगा कि वैध आलोचना, व्यंग्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति अनावश्यक प्रतिबंधों से प्रभावित हो।