सुविचारित फैसला

Nov 14, 2019

सुविचारित फैसला

अयोध्या विवादित भूमि पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वाभाविक ही चौतरफा स्वागत हो रहा है। लंबे समय से इस मामले को लेकर उलझन बनी हुई थी। इसे लेकर विभिन्न पक्षों की सियासत भी शामिल हो गई थी। दरअसल, अयोध्या के रामजन्मभूमि स्थल पर तीन पक्षों ने अपने स्वामित्व का दावा किया था। रामलला विराजमान पक्ष इस पर मंदिर बनाने की मांग कर रहा था तो निमोर्ही अखाड़े का दावा था कि संबंधित जमीन पर उसका स्वामित्व है। इसके अलावा सुन्नी वक्फ बोर्ड का कहना था कि विवादित स्थल पर चूंकि मस्जिद थी, जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाता था, उस पर उसका मालिकाना हक है। इस तरह इस मामले पर फैजाबाद की अदालत से होते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय और फिर विशेष अदालत में कई दशक सुनवाई चलती रही। कई बार इस पर आपसी बातचीत के जरिए निपटारे की पहल भी हो चुकी थी, पर कोई नतीजा नहीं निकला था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित भूमि को तीनों पक्षों में बराबर-बराबर बांटने का आदेश दे दिया था। पर उसे चुनौती दे दी गई थी। फिर सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष इस मामले की गुहार लगाई गई तो उसने चालीस दिन तक लगातार विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनने और संबंधित साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद यह फैसला दिया। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से एक तरह से इस विवाद का सर्वमान्य निपटारा हो गया है। हालांकि इस फैसले पर किसी को एतराज है, तो उसके लिए पुनर्विचार याचिका दायर करने का विकल्प खुला है, पर इसके लिए उसे ठोस सबूत जुटाने पड़ेंगे। मगर सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद अब शायद ही किसी के पास कोई ऐसा सबूत बचा हो, जो इस सुनवाई के दौरान पांच न्यायाधीशों की पीठ से अनदेखा रह गया हो। गौरतलब है कि पांच जजों की पीठ में कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जिसने किसी पक्ष पर एतराज जताया हो। सभी ने सर्वसम्मति से इस पर अपनी रजामंदी जाहिर की। सबसे बड़ी बात कि इस मामले में बहुत सुविचारित ढंग से फैसला सुनाया गया। किसी पक्ष के किसी दावे को नजरअंदाज नहीं किया गया। निमोर्ही अखाड़े के दावे को न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसने अपना दावा काफी देर से पेश किया। हालांकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी दावा देर से पेश किया था, पर सर्वोच्च न्यायालय ने उस पर गंभीरता से विचार किया। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग और अन्य तमाम साक्ष्यों का अध्ययन करने के बाद वह इस निर्णय पर पहुंचा कि रामजन्मभूमि पर पूजा का अधिकार दिया जाना चाहिए। सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन अलग देने का निर्णय दिया। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण दरअसल, जनआस्था से जुड़ा मामला है। शुरू से बहुमत मंदिर के पक्ष में रहा है। मगर लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इसे सियासी मुद्दा बना दिया था, जिसके चलते यह और उलझता चला गया था। जबकि हकीकत यह भी है कि मुसलिम समुदाय के बहुत सारे लोग इस बात से सहमत थे कि विवादित भूमि पर राम मंदिर बनना चाहिए। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले का मुसलिम समुदाय ने भी स्वागत किया है। इस फैसले पर सद्भाव और सौहार्द का जैसा परिचय मिला है, वह निस्संदेह सराहनीय है।

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