दो दशक बाद फिर गहराने लगी जल संकट की चिंता, सौराष्ट्र-कच्छ पर कमजोर मानसून की मार
कम बारिश से जलाशयों, भूजल, खरीफ फसलों और पशु चारे पर बढ़ा दबाव; किसानों और पशुपालकों के सामने सिंचाई एवं आजीविका की चुनौती
गुजरात के सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र में कमजोर मानसून ने एक बार फिर जल संकट की आशंका को बढ़ा दिया है। वर्षा की कमी का असर केवल जल उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, पशुपालन, भूजल स्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी इसका दबाव दिखाई देने लगा है। कई इलाकों में खरीफ फसलों को नुकसान का खतरा बढ़ा है, जबकि पशुओं के लिए हरे चारे और पेयजल की उपलब्धता भी चिंता का विषय बनती जा रही है।
लंबे समय तक गंभीर जल संकट से अपेक्षाकृत राहत पाने वाले सौराष्ट्र और कच्छ में बदलते मानसूनी पैटर्न ने पुराने संकट की यादें ताजा कर दी हैं। क्षेत्र के कई हिस्सों में वर्षा सामान्य स्तर से काफी नीचे रही है, जिससे किसानों को सिंचाई के लिए भूजल और अन्य वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
सौराष्ट्र-कच्छ में सामान्य से कम बारिश
मानसून अवधि के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र में लगभग 516.9 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य वर्षा करीब 633.7 मिलीमीटर मानी जाती है। इस आधार पर क्षेत्र में लगभग 20 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई।
कच्छ में स्थिति और अधिक गंभीर रही, जहां करीब 294.8 मिलीमीटर वर्षा सामान्य स्तर लगभग 481.8 मिलीमीटर के मुकाबले दर्ज की गई। इस प्रकार कच्छ में वर्षा की कमी करीब 38 प्रतिशत तक पहुंच गई।
जिलावार स्थिति में भी कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। देवभूमि द्वारका, पोरबंदर, कच्छ, जामनगर, गिर सोमनाथ, जूनागढ़ और राजकोट जैसे जिलों में सामान्य से काफी कम बारिश ने कृषि एवं जल प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों को बढ़ा दिया है।
चारे की कमी से पशुपालकों का पलायन
कच्छ और देवभूमि द्वारका के शुष्क क्षेत्रों में हरे चारे और पशुओं के लिए पेयजल की कमी ने पशुपालकों को परंपरागत चरागाह क्षेत्रों से बाहर जाने के लिए मजबूर किया है। अबडासा, लखपत और नखत्राणा जैसे क्षेत्रों से गाय, भैंस, भेड़ और बकरियों के बड़े झुंडों को उत्तर एवं मध्य गुजरात की ओर ले जाने की गतिविधियां बढ़ी हैं।
पशुपालकों के अनुसार क्षेत्र में उपलब्ध चारा बड़ी पशु आबादी की आवश्यकता के मुकाबले काफी कम है। प्रशासन द्वारा विभिन्न स्थानों पर घास वितरण केंद्र संचालित कर राहत पहुंचाने का प्रयास किया गया है, लेकिन पशुपालक संगठनों का कहना है कि मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
कच्छ प्रशासन द्वारा दर्जनों घास वितरण डिपो खोलकर बड़ी मात्रा में चारा उपलब्ध कराया गया है। इसके बावजूद पशुधन की संख्या को देखते हुए राहत व्यवस्था को और व्यापक बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
दूध उत्पादन पर भी पड़ सकता है असर
चारे की कमी का प्रभाव दुग्ध उत्पादन पर भी दिखाई देने लगा है। पशुपालकों और डेयरी क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों के अनुसार पर्याप्त पोषण न मिलने से पशुओं की दूध देने की क्षमता प्रभावित होती है, जिससे डेयरी सहकारी समितियों की दैनिक दूध खरीद में भी गिरावट आ सकती है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण वैकल्पिक स्रोत है। ऐसे में लंबे समय तक चारे और पानी की कमी बनी रहने पर इसका असर दूध उत्पादन के साथ-साथ पशुपालक परिवारों की आय पर भी पड़ सकता है।
मूंगफली और कपास की फसल पर बढ़ा खतरा
सौराष्ट्र गुजरात के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में शामिल है और विशेष रूप से मूंगफली तथा कपास उत्पादन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। गुजरात देश के कुल मूंगफली उत्पादन में बड़ा योगदान देता है और इसका महत्वपूर्ण हिस्सा सौराष्ट्र एवं कच्छ क्षेत्र से आता है।
कम बारिश के कारण कई खेतों में मिट्टी की नमी तेजी से घटने लगी है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां किसानों के लिए फसल को बचाना मुश्किल होता जा रहा है।
कृषि एवं तेल उद्योग से जुड़े संगठनों ने आशंका जताई है कि यदि समय पर पर्याप्त वर्षा या सिंचाई जल उपलब्ध नहीं हुआ तो मूंगफली उत्पादन पर उल्लेखनीय प्रभाव पड़ सकता है। इससे खाद्य तेल उद्योग की कच्चे माल की उपलब्धता और कीमतों पर भी असर पड़ने की संभावना है।
कपास उत्पादक किसानों के सामने भी समान चुनौती है। कई क्षेत्रों में बोरवेल और कुएं सूखने या उनका जलस्तर नीचे जाने से किसानों के पास सिंचाई के सीमित विकल्प बचे हैं।
भूजल पर बढ़ता दबाव
कम वर्षा का सबसे गंभीर प्रभाव भूजल संसाधनों पर पड़ सकता है। ग्रामीण इलाकों में कुओं और बोरवेल के माध्यम से सिंचाई करने वाले किसान लगातार गिरते जलस्तर से चिंतित हैं।
पर्याप्त मानसूनी पुनर्भरण नहीं होने की स्थिति में आने वाले महीनों में भूजल की उपलब्धता और कम हो सकती है। इससे केवल कृषि ही नहीं, बल्कि ग्रामीण पेयजल आपूर्ति भी प्रभावित होने की आशंका रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सौराष्ट्र और कच्छ जैसे अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्रों में जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन और भूजल पुनर्भरण जैसी दीर्घकालिक व्यवस्थाओं को और मजबूत करना आवश्यक है।
गुजरात में जल संकट का पुराना इतिहास
गुजरात के कई हिस्से इससे पहले भी गंभीर जल संकट का सामना कर चुके हैं। 1986-87 के भीषण सूखे के दौरान राजकोट सहित कई शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति के लिए विशेष व्यवस्थाएं करनी पड़ी थीं। पानी को दूरस्थ स्रोतों से लाकर वितरण किया गया और टैंकरों पर निर्भरता काफी बढ़ गई थी।
कई क्षेत्रों में पानी की पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़कों तक को खोदा गया था। संकट की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुछ इलाकों में पानी खरीदना गरीब परिवारों के लिए भोजन से भी अधिक महंगा साबित हो रहा था।
इसके बाद टैंकर आधारित जल आपूर्ति एक बड़े व्यवसाय के रूप में उभरी। वर्ष 2000 के आसपास जलाशयों का स्तर तेजी से गिरने के कारण गुजरात को एक बार फिर गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा था और बड़े स्तर पर आपातकालीन जल आपूर्ति योजनाएं लागू करनी पड़ी थीं।
राहत और सरकारी हस्तक्षेप की मांग तेज
कृषि संगठनों और किसान प्रतिनिधियों ने गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने, पशुओं के लिए चारा वितरण बढ़ाने और जरूरतमंद किसानों को आर्थिक सहायता देने की मांग की है।
कुछ किसान संगठनों ने अत्यधिक प्रभावित क्षेत्रों को सूखा प्रभावित घोषित करने की भी मांग उठाई है। उनका तर्क है कि केवल वर्षा के आंकड़ों के बजाय फसलों की वास्तविक स्थिति, मिट्टी की नमी, भूजल उपलब्धता और पशुधन की स्थिति को भी राहत संबंधी निर्णयों में शामिल किया जाना चाहिए।
राज्य सरकार का रुख रहा है कि सूखा घोषित करने का निर्णय केवल वर्षा की कमी के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए फसलों की स्थिति का वैज्ञानिक मूल्यांकन और प्रभावित क्षेत्रों का भौतिक सत्यापन भी आवश्यक होता है।
दीर्घकालिक जल प्रबंधन की जरूरत
सौराष्ट्र और कच्छ की मौजूदा परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि जल संकट को केवल कमजोर मानसून से जुड़ी अस्थायी समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता। जलवायु में बढ़ती अनिश्चितता के बीच कृषि, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए दीर्घकालिक जल प्रबंधन रणनीति की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।
वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, सूक्ष्म सिंचाई, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन, जलाशयों की क्षमता बढ़ाने तथा फसल विविधीकरण जैसी पहलें ऐसे क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
दो दशक पहले के गंभीर जल संकट के बाद गुजरात ने जल प्रबंधन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। कमजोर मानसून के मौजूदा संकेत इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि जल सुरक्षा के लिए किए गए प्रयासों को निरंतर मजबूत रखना आवश्यक है, ताकि वर्षा में असमानता का प्रभाव किसानों, पशुपालकों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर न्यूनतम रखा जा सके।
