ग्लोबल वार्मिंग 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के करीब, दुनिया के सामने बढ़ता जलवायु संकट
वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि दुनिया को एक गंभीर जलवायु मोड़ के करीब ले जा रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की हालिया आकलन रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के बेहद करीब पहुंच चुकी है। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय चिंता तक सीमित नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक असमानता जैसे अनेक क्षेत्रों पर व्यापक प्रभाव डाल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशकों में तकनीकी प्रगति महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, लेकिन केवल तकनीक के भरोसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को पूरी तरह पलटना संभव नहीं होगा। तापमान में बढ़ोतरी से जुड़ी कुछ प्रक्रियाएं ऐसी हैं जिनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है और कई मामलों में इन परिवर्तनों को पूरी तरह वापस लाना कठिन होगा।
दक्षिण एशिया जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों के लिए यह चुनौती और अधिक गंभीर हो सकती है। बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, समुद्र स्तर में वृद्धि, प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और संसाधनों पर बढ़ता दबाव जनजीवन तथा अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित कर सकता है। आय में असमानता और तकनीक तक असमान पहुंच इस संकट को और जटिल बना सकती है।
हीट क्लॉक और ग्लेशियर क्लॉक की रफ्तार अलग
जलवायु विज्ञान में तापमान वृद्धि और उसके प्रभावों को समझने के लिए अक्सर अलग-अलग समय पैमानों का उल्लेख किया जाता है। तापमान में गिरावट होने पर अत्यधिक गर्मी से जुड़ा असर अपेक्षाकृत तेजी से कम हो सकता है, लेकिन ग्लेशियरों और समुद्र स्तर से जुड़े प्रभाव इतने जल्दी समाप्त नहीं होते।
एक बार बड़े पैमाने पर हिमनदों का क्षरण शुरू हो जाने पर उन्हें फिर से पूर्व स्थिति में लाना बेहद कठिन हो सकता है। इसी तरह समुद्र स्तर में वृद्धि का असर भी दशकों और कई मामलों में उससे अधिक समय तक बना रह सकता है। इसलिए तापमान में थोड़ी कमी आ जाने भर से जलवायु संकट पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा सकता।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बड़ा जोखिम
जलवायु परिवर्तन का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। तापमान में बढ़ोतरी, सूखा, बाढ़, वर्षा चक्र में अस्थिरता और जल उपलब्धता में बदलाव किसानों की उत्पादकता और आय को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां बड़ी आबादी खेती और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, जलवायु परिवर्तन आर्थिक असुरक्षा को बढ़ा सकता है। इसके कारण ग्रामीण परिवारों के विस्थापन, आजीविका परिवर्तन और शहरों की ओर पलायन की स्थिति भी बन सकती है।
जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं
तेजी से बदलती जलवायु ने इस विषय को केवल पर्यावरणीय विमर्श से निकालकर व्यापक आर्थिक और सामाजिक चुनौती में बदल दिया है। स्वास्थ्य पर बढ़ता दबाव, ऊर्जा की मांग में वृद्धि, बुनियादी ढांचे को नुकसान, बीमा लागत, कृषि नुकसान और आपदा प्रबंधन पर बढ़ता खर्च सरकारों तथा
उद्योगों दोनों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है।
ऐसी स्थिति में कंपनियों और निवेशकों के लिए भी जलवायु जोखिम को अपनी दीर्घकालिक रणनीति में शामिल करना आवश्यक होता जा रहा है। सप्लाई चेन, उत्पादन केंद्र, ऊर्जा स्रोत और कच्चे माल की उपलब्धता पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कॉरपोरेट निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।
ऐतिहासिक जिम्मेदारी और जलवायु न्याय पर बढ़ता जोर
जलवायु परिवर्तन की बहस में ऐतिहासिक जिम्मेदारी और जलवायु न्याय महत्वपूर्ण मुद्दे बनकर उभरे हैं। जिन देशों ने औद्योगिकीकरण के लंबे दौर में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अधिक योगदान दिया है, उनसे विकासशील और संसाधन सीमित देशों की सहायता में बड़ी भूमिका निभाने की अपेक्षा की जा रही है।
इस संदर्भ में निष्पक्ष तकनीक हस्तांतरण, जलवायु वित्त, कार्बन ऋण की जिम्मेदारी और नुकसान एवं क्षति की भरपाई जैसे विषय वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण हो गए हैं। जलवायु नीतियों में यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि आर्थिक रूप से कमजोर देशों और समुदायों पर परिवर्तन की लागत असमान रूप से न डाली जाए।
