3 डिग्री तापमान वृद्धि पर बुजुर्गों को साल में 2,000 घंटे से अधिक झेलना पड़ सकता है खतरनाक हीट स्ट्रेस
भारत पर सबसे अधिक असर की आशंका; जून से सितंबर के बीच शरीर की प्राकृतिक शीतलन क्षमता से बाहर जा सकती हैं गर्मी की स्थितियां
वैश्विक तापमान यदि पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है, तो दिल्ली और भारत के इंडो-गैंगेटिक प्लेन जैसे क्षेत्रों में बुजुर्ग आबादी को वर्ष के लगभग 2,020 घंटे तक ऐसी भीषण गर्मी का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें शरीर स्वयं को पर्याप्त रूप से ठंडा नहीं कर पाता। एक वैश्विक मॉडलिंग अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है कि गर्मी का सबसे गंभीर प्रभाव विशेष रूप से जून से सितंबर के बीच देखने को मिल सकता है।
इस स्थिति को Uncompensable Heat Stress कहा जाता है। इसका अर्थ ऐसी गर्मी से है जिसमें मानव शरीर पसीने और अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से पर्याप्त तेजी से तापमान कम नहीं कर पाता। लंबे समय तक ऐसी गर्मी में रहने से हाइपरथर्मिया का खतरा बढ़ सकता है और पहले से मौजूद हृदय, श्वसन तथा किडनी संबंधी बीमारियां अधिक गंभीर हो सकती हैं।
दिल्ली और इंडो-गैंगेटिक प्लेन सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में
अध्ययन के अनुसार दिल्ली के बुजुर्गों को वैश्विक तापमान वृद्धि के अलग-अलग स्तरों पर हीट स्ट्रेस की अवधि में तेज बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है।
लगभग 1.5°C तापमान वृद्धि की स्थिति में दिल्ली की वृद्ध आबादी को साल में करीब 880 घंटे गंभीर हीट स्ट्रेस झेलना पड़ सकता है। यह अवधि 2°C तापमान वृद्धि पर लगभग 1,228 घंटे, 3°C पर करीब 2,020 घंटे और 4°C तापमान वृद्धि पर लगभग 2,726 घंटे तक पहुंच सकती है।
इंडो-गैंगेटिक प्लेन को दुनिया के प्रमुख ‘हीट रिस्क हॉटस्पॉट्स’ में शामिल किया गया है। तापमान बढ़ने के साथ इस क्षेत्र में मानव शरीर की गर्मी सहने की क्षमता पर दबाव तेजी से बढ़ सकता है।
भारत में 64.8 करोड़ लोगों पर पड़ सकता है असर
अध्ययन का अनुमान है कि भारत में लगभग 648 मिलियन यानी 64.8 करोड़ लोग साल में 180 घंटे से अधिक खतरनाक गर्मी की स्थिति का सामना कर सकते हैं।
इस मामले में भारत के बाद चीन और पाकिस्तान जैसे देशों में भी बड़ी आबादी के प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। भारत की विशाल आबादी, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और गर्म एवं आर्द्र जलवायु वाले कई क्षेत्रों के कारण यहां जोखिम अपेक्षाकृत अधिक माना गया है।
जून से सितंबर के बीच जोखिम सबसे अधिक
गर्मी से जुड़ा सबसे बड़ा खतरा जून से सितंबर के बीच केंद्रित रहने की आशंका है। इन चार महीनों में कुल लगभग 2,880 घंटे होते हैं और अध्ययन के अनुसार तापमान वृद्धि की गंभीर स्थिति में इनमें से बड़ी अवधि के दौरान शरीर की प्राकृतिक शीतलन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
विशेष रूप से दिन के साथ-साथ रात के समय भी तापमान ऊंचा रहने से शरीर को गर्मी से उबरने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता। लगातार गर्म रातें बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए जोखिम को और बढ़ा सकती हैं।
उम्र बढ़ने के साथ घटती है गर्मी सहने की क्षमता
अध्ययन में युवा, मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्गों के लिए अलग-अलग शारीरिक हीट-टॉलरेंस सीमा का उपयोग किया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार उम्र बढ़ने के साथ शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।
बुजुर्गों में पसीना निकलने की प्रक्रिया, रक्त परिसंचरण और शरीर के भीतर तापमान संतुलित रखने की क्षमता अपेक्षाकृत कम प्रभावी हो सकती है। इसी कारण समान तापमान की स्थिति में वृद्ध आबादी पर गर्मी का प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के साथ तेजी से बढ़ेगा खतरा
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार वैश्विक तापमान पहले ही पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में लगभग 1.4°C तक बढ़ चुका है, जबकि एक हालिया वर्ष का औसत तापमान करीब 1.5°C अधिक दर्ज किया गया।
अध्ययन यह संकेत देता है कि यदि तापमान वृद्धि को सीमित नहीं किया गया तो हीट स्ट्रेस का जोखिम धीरे-धीरे नहीं बल्कि कई क्षेत्रों में तेजी से बढ़ सकता है। खासकर 3°C और 4°C तापमान वृद्धि वाले परिदृश्य में मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव गंभीर हो सकता है।
दिल्ली, लाहौर और दुबई उच्च जोखिम वाले शहर
शोध में दिल्ली के साथ लाहौर और दुबई को भी अत्यधिक गर्मी के लिहाज से उच्च जोखिम वाले शहरी क्षेत्रों में शामिल किया गया है।
3°C से 4°C तापमान वृद्धि की स्थिति में दिल्ली में जून से सितंबर के दौरान दिन और रात दोनों समय हीट टॉलरेंस सीमा पार होने की संभावना 60 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकती है।
तेजी से गर्म होते शहर, घनी आबादी, कंक्रीट आधारित निर्माण और सीमित हरित क्षेत्र ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव को बढ़ाते हैं, जिससे बड़े शहरों में वास्तविक तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक महसूस हो सकता है।
गरीब बस्तियों में जोखिम और अधिक
अनौपचारिक बस्तियों और कम आय वाले क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है। अध्ययन के अनुसार कुछ ऐसे घरों के अंदर का तापमान नजदीकी आधिकारिक मौसम केंद्रों की तुलना में लगभग 2°C तक अधिक हो सकता है।
कम वेंटिलेशन, टिन या अन्य गर्मी सोखने वाली छतें, एयर कंडीशनिंग की सीमित उपलब्धता और घनी आबादी के कारण गरीब परिवारों को अत्यधिक गर्मी का अनुपातहीन असर झेलना पड़ सकता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए बड़ा संकेत
यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि बढ़ता तापमान केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी नियोजन संकट भी बन सकता है।
हीट एक्शन प्लान, शीतलन केंद्र, पर्याप्त पेयजल, स्वास्थ्य निगरानी, कार्यस्थलों पर गर्मी से सुरक्षा, बुजुर्गों के लिए विशेष सहायता और शहरों में हरित क्षेत्रों के विस्तार जैसी व्यवस्थाएं अत्यधिक गर्मी से होने वाले नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के बीच यह आवश्यक होता जा रहा है कि शहरों की योजना केवल वर्तमान तापमान को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में संभावित अधिक गर्म परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार की जाए।
