राहत की पढ़ाई-सत्येन्द्र सिंह-Satendra Singh

Mar 06, 2019

राहत की पढ़ाई

शिक्षा व्यवस्था पर किए गए ज्यादातर अध्ययन यह बताते हैं कि स्कूली बच्चों में पढ़ाई-लिखाई के प्रति अरुचि या उसे बोझ की तरह लेने का एक बड़ा कारण उनके कंधों पर जरूरत से ज्यादा भारी बस्ते का टंगा होना है। इसलिए अनेक शिक्षाविद लंबे समय से यह सुझाव देते रहे हैं कि स्कूली बच्चों पर किताबों के बोझ को कम किया जाना चाहिए। सरकारों की ओर से कई बार इस दिशा में कदम उठाने की बातें कही गर्इं। यों दिल्ली में पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों को होमवर्क नहीं दिया जाता है। लेकिन देश भर में बस्ते के बोझ को कम करने के लिए अब तक कोई ठोस योजना सामने नहीं आ सकी है। अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से जारी ताजा दिशानिर्देश पर अगर ठीक से अमल हुआ तो आने वाले समय में स्कूली बच्चों को भारी बस्ते के बोझ से बड़ी राहत मिलेगी। मंत्रालय के स्कूली शिक्षा व साक्षरता विभाग की ओर से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी परिपत्र के मुताबिक, पहली और दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों को अब होमवर्क से मुक्ति मिल जाएगी। इसके अलावा, किताब-कापियों के उनके बस्ते का वजन अधिकतम डेढ़ किलो होगा। इसी तरह तीसरी से दसवीं कक्षा तक के बच्चों के बस्ते का अधिकतम वजन भी तय कर दिया गया है। दरअसल, इस तरह की पहलकदमी की जरूरत काफी पहले से महसूस की जा रही थी। निश्चित रूप से स्कूली बच्चों के कंधे पर यह बोझ कक्षा की किताबों और कॉपियों का होता है, लेकिन उसके भार तले उनका शरीर और मन-मस्तिष्क भी दबा होता है।

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यही वजह है कि बहुत सारे बच्चे स्कूली शिक्षा को अपनी जीवन-चर्या का सहज हिस्सा न मान कर, उसे एक जबरन निबाहने वाली ड्यूटी के तौर पर देखते हैं। खासतौर पर शुरूआती कक्षाओं में दाखिला लेने वाले बच्चों की उम्र कई बार काफी कम होती है और उन्हें भी न केवल स्कूलों में अपनी कक्षाएं पूरी करनी पड़ती हैं, बल्कि आमतौर पर होमवर्क के रूप में घर में पढ़ाई पर समय देना पड़ता है। जिस उम्र में खेलना और अपने मन से कुछ नया करने-सीखने की कोशिश बच्चों की सामान्य इच्छा होती है उसमें उन्हें किताब-कॉपियों का भारी थैला उठाना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी सेहत और रचनात्मकता पर पड़ता है। बिना दिलचस्पी के की जाने वाली पढ़ाई का ही नतीजा यह होता है कि ज्यादातर बच्चों को किताबों में से कोई नई चीज सीखने के लिए अपेक्षया ज्यादा वक्त लगाना पड़ता है। दरअसल, बोझ की तरह पढ़ने का सीधा असर सीखने की प्रक्रिया पर पड़ता है। पिछले कुछ सालों से लगातार ऐसी रिपोर्ट सामने आती रही हैं, जिनके मुताबिक पांचवीं या छठी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे दूसरी या तीसरी कक्षा की किताबें भी ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। इसकी मुख्य वजह यही है कि बच्चों के भीतर सीखने की सहज प्रक्रिया पर किताबों से लेकर शिक्षण पद्धति का बोझ भारी पड़ता है। जबकि बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रख कर तैयार किए गए विषय और पाठ्यक्रम ही कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों में सीखने के प्रति रुचि पैदा कर सकते हैं और इसके बाद पढ़ाई लिखाई को लेकर वे सहज हो सकते हैं। बिना जरूरत की किताबों से भरे थैले और गैरजरूरी विषयों में बच्चों को उलझाना और उनके खेलने या अपनी तरह से कुछ करने की इच्छा को बाधित करके बेहतर नतीजे हासिल नहीं किए जा सकते।

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